सूरतगढ़। “ये बेचारा काम के बोझ का मारा इसे चाहिये हमदर्द का टॉनिक सिंकारा”। पिछले दिनों उपजिला चिकित्सालय के अस्थिरोग विशेषज्ञ डॉ भारत भूषण जांगिड़ की काम की अधिकता की शिकायत सुनकर सहसा ही यह विज्ञापन याद आ गया। 90 के दशक के इस विज्ञापन में काम के बोझ से परेशान एक शख्स का चित्रण था, जिसे सिंकारा टॉनिक पीने की सलाह दी जाती है। बहरहाल काम की अधिकता से परेशान डॉ भारत भूषण विज्ञापन में दिख रहे व्यक्ति की तरह सिंकारा टॉनिक लेने की बजाय पिछले कई सालों से कामचोरी के नये नये पेंतरे आजमा रहे थे।
दरअसल प्रत्येक सोमवार को जब हॉस्पिटल में ओपीडी सबसे ज्यादा रहती हैं, डॉ साहब छुट्टी रख लेते थे। इसके अलावा नाइट ड्यूटी की जगह ऑन कॉल ड्यूटी कर डॉ साहब सप्ताह में एक और दिन छुट्टी ले लेते। रविवार और सरकारी छुट्टी के दिन वैसे भी 2 घंटे ही हॉस्पिटल खुलता है तो कुल मिलाकर सप्ताह 3 दिन डॉ साहब आराम से अपनी प्राइवेट प्रैक्टिस रहे थे। बाकी बचे 4 दिन तो इन दिनों में भी डॉ साहब स्कूल की तरह बँक मार कर बीच बीच में अपना क्लिनिक संभाल आते थे।
वैसे भी डॉ साहब बखूबी समझते है कि सरकारी अस्पताल में मुफ्त में दिखाने के लिए आये गरीब मरीजों का क्या है, उन्हें तो वैसे भी इंतज़ार करने की आदत है ? अगर मरीज घंटा आध घंटा और इंतज़ार कर भी लेंगे तो उनको क्या फर्क पड़ता है। कुल मिलाकर सूरतगढ़ में काम के बोझ से थके डॉ साहब की 5 साल से अच्छी कट रही थी। डॉ साहब को यह शहर इसलिये भी भा रहा था क्यूंकि उन्हें मालूम है कि इस शहर में अब कोई नेता नहीं रहा, बस फोटोजीवी ही बचे है। सरकारी अस्पताल में आम आदमी को इलाज मिल रहा है या नहीं, इससे इन फोटोजीवियों का रत्ती भर लेना देना नहीं है ? इन फोटोजीवीयों के लिए राजनीति महज धार्मिक आयोजनों में फूल बरसाने, नारेबाज़ी या फिर चौक चौराहों पर पुतले फूँकना और हुडदंग मचाना मात्र है। तो डॉ साहब को ऐसे मरीज और फोटोजीवी नेता एक साथ इस शहर में मिल गए सो उन्हें क्या चाहिये था ?
कॉमरेड बुडानिया की एंट्री से डॉ साहब की लाइफ में पड़ा खलल, कथित इस्तीफा देकर विक्टिम कार्ड खेलने की कोशिश
जैसा कि कहते है “सब दिन होत न एक समाना”। डॉ साहब की आराम तलब लाइफ को ना जाने किसकी नज़र लग गई है। कॉमरेड पृथ्वीराज बुढ़ानिया ने डॉ साहब की आराम से चल रही लाइफ में खलल डाल दिया। कॉमरेड बुडानिया ने डॉ साहब सहित सभी डॉक्टर्स को सोमवार व मंगलवार को छुट्टी नहीं देने मांग कर दी। लेकिन डॉक्टर साहब को ये कैसे बर्दाश्त होता कि कोई व्यक्ति उन्हें अपने शेड्यूल मे बदलाव करने को कह दे। इसलिये मरीजों का ख्याल कर सोमवार को ड्यूटी पर आने की बजाय डॉ साहब ने विक्टिम कार्ड खेलते हुए प्रभारी को अपना कथित इस्तीफा भिजवा दिया है।
अपने कथित इस्तीफे में डॉ साहब कह रहे है कि पहले 3-3 हड्डी रोग विशेषज्ञ अस्पताल में थे और अब उन्हें अकेले तीनों का भार उठाना पड़ रहा है ? इस बात से इनकार नहीं है कि राजकीय चिकित्सालय में OPD ज्यादा है। लेकिन डॉक्टर साहब भूल जाते हैं कि इसी अस्पताल में डॉ शैलेंद्र सिंह, डॉ रमेश सोखल, मांगीलाल लेघा जैसे डॉ भी है जो सोमवार ही नहीं आम दिनों में भी आपसे ज्यादा मरीजों को देखते है और आपकी तरह ड्यूटी से बंक भी नहीं मारते। सच तो ये ही सोमवार को छुट्टी रखना नियम विरुद्ध होने के साथ साथ मरीजों के साथ सीधा अन्याय है। जिसे किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं किया जा सकता।
डॉ जांगिड़ का मरीज विरोधी रवैईया आया सामने, साख बचाने के मुद्दे को भटकाने की कर रहे कोशिश
इस पुरे प्रकरण ने डॉ भारत भूषण के अहंकार और मरीज विरोधी चरित्र की पोल खोल कर रख दी है। इसीलिए कुछ सोशल मीडिया इन्फलुऐंसर और पैड खबरों के जरिये कुछ फ़र्ज़ी तथ्यों को फैलाकर अपनी छवि में लग चुके डेंट को कम कर खुद को पीड़ित दिखाने की कोशिश कर रहे है। इसके साथ ही इस आंदोलन को गलत साबित करने की कोशिश भी डॉ साहब के समर्थकों द्वारा की जा रही है।
डॉ साहब के समर्थन में यह बात फैलाने की कोशिश की जा रही है कि डॉ साहब अगर सोमवार को छुट्टी रखकर बाकी दिन काम कर ही रहे है इससे क्या फर्क पड़ता है ? मरीजों को बाकी दिन तो डॉ साहब की सेवाओं का फायदा मिल रहा था। कुछ कम समझ वाले लोग यह भी कह रहे है कि डॉ साहब को यह अधिकार है कि वह जिस दिन चाहे उस दिन साप्ताहिक अवकाश ले सकते है। ऐसे सभी लोगों को यह जान लेना चाहिये कि ये डॉक्टर की सरकारी नौकरी कोई घर की खेती नहीं है। यह सरकार के नियमों से चलती है। ज़ब विभाग का नियम है कि सोमवार और मंगलवार को अस्पतालों में ओपीडी की संख्या अधिक होती है, इसलिये साप्ताहिक अवकाश स्वीकृत नहीं किया जाये तो डॉ साहब कोई लाट साहब नहीं है कि उन्हें सोमवार को छुट्टी दी ही जाये।
इसके अलावा कुछ लोग डॉ साहब के छुट्टी पर जाने से आंदोलनकारी नेताओं को कठघरे में खड़े करने कि कोशिश कर रहे है। उनका कहना है कि पहले डॉ साहब सप्ताह में 5 दिन तो मरीजों को देख रहे थे अब आंदोलनकारीयों ने डॉक्टर को भगा दिया और मरीज ज्यादा परेशान हो रहे है। दरअसल ये वही लोग है जो खुद संघर्ष नहीं कर सकते, हां अगर दूसरा कोई प्रयास करता है तो उनके पेट में दर्द शुरू हो जाता है। ऐसे लोगों की हिम्मत नहीं हो रही कि हॉस्पिटल जाकर सच के साथ खड़े हो। इसलिये ये लोग सोशल मीडिया पर क्रांतिवीर बनकर टांग खिंचाई शुरू करने लग जाते है।
असलियत तो ये है राजकीय चिकित्सालय का सिस्टम जो पूरी तरह से सड़ चुका है उसकी वजह शहर के ऐसे हो लोग और इस शहर के फोटोजीवी नेता है जिनकी रीढ़ की हड्डी में अब सीधा खड़े रहने की ताक़त नहीं बची है। जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण है कि 15 दिन से चल रहे इस घटनाक्रम के बाद भी इन नेताओं में ये कहने की हिम्मत नहीं है कि डॉक्टर साहब आपकी जिद और रवैया गलत है।
सोमवार को चिकित्सालय में हुए घटनाक्रम के दौरान आंदोलनकारी नेताओं द्वारा प्रशासन से डॉक्टर की वैकल्पिक व्यवस्था की मांग का भी कुछ लोगों द्वारा यह कहकर मजाक उड़ाया जा रहा है कि जो लोग सोमवार सहित सप्ताह में 6 दिन डॉक्टर को देखना चाह रहे थे वे अब सप्ताह में दो-तीन दिन ही डॉक्टर लगाने के लिए गिड़गिड़ा रहे है। ऐसे लोग यह भूल जाते हैं कि ज़ब भी जनहित का कोई आंदोलन होता है तो उसकी कुछ कीमत भी जनता को भी चुकानी पड़ती है और जब सिस्टम संवेदनशील नहीं हो कई बार आंदोलन लंबा भी खींचता है। ऐसे में आंदोलन से जुड़े अग़वा लोग कोशिश करते है कि आंदोलन की वजह से आमजन को परेशानी कम से कम हो। यह आंदोलन भी दूसरे आंदोलनों से अलग नहीं है इसीलिए आंदोलन के अगुवा लोगों ने यह मांग की थी।
आंदोलन से सदाश्यता के बावजूद ऐसी बातों से सवाल उठाकर आंदोलन को कमजोर करने में सहयोग करने वाले इन लोगों को अभी थोड़ा और समझना होगा ? वैसे भी राजस्थानी में एक कहावत है कि “चिड़पिड़े सुहाग सुं रंडिपो भलो”। अगर डॉ साहब का ध्यान हॉस्पिटल के मरीजों की बजाय अपनी प्रैक्टिस चमकाने पर ज्यादा है तो फिर भले ही कुछ दिन की परेशानी हो शहर की जनता को नया डॉक्टर को लगाने की मांग बुलंद करनी चाहिये। वैसे भी डॉ साहब की बदौलत शहर का यह हॉस्पिटल महज रेफरल सेंटर बनकर रह गया है।
कुल मिलाकर जन आंदोलनो का विरोध कोई नई बात नहीं है। जो लोग लड़ नहीं सकते उनके लिए विरोध करना ही एकमात्र विकल्प है। लेकिन शहर का कोई भी जिम्मेदार नागरिक अगर चाहता है कि राजकीय चिकित्सालय की व्यवस्थाओं में सुधार हो तो यह जरूरी है कि वे आंदोलन के समर्थन में खड़े हो। आंदोलन का समर्थन आप सोशल मीडिया से लेकर फिजिकल प्रेजेंस से कर सकते है। आज से पहले आपने और हमने जनआंदोलनों से अपने आप को दूर रखकर तमाशा देखा है। यही वजह है कि सरकारी अस्पताल सहित शहर के सरकारी विभागों का सिस्टम इतना खराब हो चुका है कि आम आदमी उसको कोसने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहा है। कॉमरेड पृथ्वीराज बुडानिया को हम ज्यादा नहीं जानते लेकिन मुझे लगता है कि जिस संजीदगी से उन्होंने अस्पताल की अव्यवस्थाओं का मुद्दा उठाया है, शहर के जागरूक लोगों को उनके साथ खड़ा होना चाहिये।
–राजेंद्र पटावरी, पूर्व अध्यक्ष -प्रेस क्लब, सूरतगढ़।






















































































































































































































































