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जिला बनाओ अभियान का सच : जिम्मेदारों की नकारात्मक भूमिका (पार्ट-1)

बात कड़वी जरूर है लेकिन सच यही है। जिला बनाओ अभियान समिति के पदाधिकारी हो या फिर राजनेता या फिर व्यापारी, इनमें से कोई भी वर्ग ऐसा नहीं है जो इस आंदोलन को चला कर खुश है।

सूरतगढ़। सूरतगढ़ को जिला बनाने की मांग को लेकर रेंग रहा आंदोलन अब इच्छा मृत्यु की ओर अग्रसर है। इच्छा मृत्यु कहना इसलिए वाजिब होगा कि जिन लोगों के हाथ में इस आंदोलन की बागडोर है वे लोग इस आंदोलन को चलाना नहीं चाहते हैं। यह बात कड़वी जरूर है लेकिन सच यही है। जिला बनाओ अभियान समिति के पदाधिकारी हो या फिर राजनेता या फिर व्यापारी, इनमें से कोई भी वर्ग ऐसा नहीं है जो इस आंदोलन को चला कर खुश है। बेमन से किया गया कोई भी काम कब सफल हुआ है ऐसा ही कुछ अब इस आंदोलन के साथ होने को है।

सबसे पहले बात करे जिला बनाओ अभियान समिति की। हक़ीक़त यह है कि जिला बनाओ अभियान समिति जो सूरतगढ़ को जिला बनाने की मांग को पुरजोर तरीके से रखने में असफल रही अब वही समिति अपने पर लगे दाग आंदोलन करने की नौटंकी कर धोना चाहती है। पूरे राजस्थान के बच्चे बच्चे को ज़ब पता था कि गहलोत सरकार बजट में नए जिलों की घोषणा करने वाली है। तब इस समिति और इसके झंडाबरदार चादर तानकर सोए रहे। समिति के सदस्य अब आरोप लगा रहे हैं उन्हें आमजन का सहयोग नहीं मिला। मैं समिति से ही पूछना चाहता हूं कि ज़ब उन्हें पहले आमजन का सहयोग नहीं मिला तो फिर अब क्यों उम्मीद कर रहे हैं ?

सच्चाई यह है कि समिति के पदाधिकारी छपास रोग से पीड़ित रहे और जिला बनाने के आंदोलन की नौटंकी करते रहे। समिति पदाधिकारियों की कुंभकरणी नींद का आलम यह रहा कि जब अनूपगढ़ से कुलदीप इंदौरा के नेतृत्व में सैकड़ों लोगों को बुलाकर मुख्यमंत्री गहलोत ने जिला बनाने को लेकर आश्वस्त कर दिया तब भी इस समिति की तंद्रा नहीं टूटी। लेकिन अब जब सांप निकल गया तो लाठी पीटने की नौटंकी समिति कर रही है। नौटंकी इसलिए कहना पड़ रहा है कि अभियान समिति की अब तक आधा दर्जन से अधिक बैठके हो चुकी है। समिति में स्टीयरिंग कमेटी के नाम करीब 5 दर्जन लोगों के नाम भी जोड़ लिए गए हैं। लेकिन समिति अब तक आंदोलन को लेकर कोई रूपरेखा तय नहीं कर पाई है। हालांकि इसकी वजह समिति में शामिल व्यापारी नेताओं और शुद्ध राजनेताओं का असहयोग भी है। लेकिन घंटो-घंटो की बैठकें कर सुझाव लेने वाली यह समिति और इसके पदाधिकारी बातों को ही मठोरते रहते हैं। बैठकों में आये एक भी सुझाव पर अमल करने की जहमत समिति और उसके पैरोकारों ने नहीं की है। बस जबानी लफ़्फ़ाजी से काम चलाया जा रहा है।

हालत यह है कि जो लोग अपने जीवन को दांव पर लगाकर इस आंदोलन में आमरण अनशन की आहुति दे रहे हैं,उन लोगों के पास रात के समय कुछ लोगों की ड्यूटी भी समिति अब तक नहीं लगा पाई है। समिति की बला से आंदोलन में आहुति देने वाले लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है ! कहने का मतलब ये है कि इस समिति में कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति नहीं है जो कोई निर्णय ले सके और उस निर्णय को लागू करने के लिए समिति सदस्यों को कह सकें ?

बहरहाल बात यहीं तक खत्म नहीं होती हालात यह है कि समिति पदाधिकारियों और इसमें शामिल नेताओं को यह भी गवारा नहीं है कि कोई व्यक्ति इस मंच से जिला बनाने की मांग को मजबूती से रखने के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ अपनी भावनाएं व्यक्त कर दे। इसलिए समिति ने मंच से माइक के जरिए भाषण बाजी को प्रतिबंधित कर दिया गया है। यह किस तरह का आंदोलन है जहां पर लोगों को अपनी बात रखने की भी आजादी नहीं है। जब लोग अपने विचार नहीं रखेंगे, अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं कर पाएंगे तो कौन इस आंदोलन से जुड़ेगा ? पिछले कुछ दिनों से आंदोलन स्थल पर छायी मरघट सी ख़ामोशी ये बताने के लिये काफ़ी है कि समिति और उसके नेता सच्चाई सुनना नहीं चाहते है। लेकिन समिति कैसे यह भूल जाती है कि लोकतंत्र में विचारों के प्रवाह को रोककर कोई आंदोलन खड़ा नहीं हो सकता !

कुल मिलाकर जिला बनाओ अभियान समिति इस शहर के लोगों की भावनाओं से खेलने का एक टूल बन चुकी  है। यह समिति इस आंदोलन को किस तरह से खत्म करना चाहती है इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि समिति द्वारा आंदोलन के कार्यक्रमों में जानबूझकर कुछ दिनों का गेप रखा जा रहा है। कहना गलत नहीं होगा कि इसी वजह से शहर के बहुसंख्यक लोग इस आंदोलन से अपेक्षित रूप में नहीं जुड़ पा रहे हैं ? साफ शब्दों में समिति पदाधिकारियों द्वारा रस्म अदायगी की जा रही है। समिति से जुड़े ज्यादातर पदाधिकारी अपना अमूल्य समय इस फालतू आंदोलन में लगाना नहीं चाहता है ?

हालांकि समिति में कुछ एक लोग साफ मन से भी जुड़े हैं उन लोगों को पीड़ा भी है कि सूरतगढ़ जिला नहीं बना और वे लोग चाहते हैं कि आंदोलन चले। लेकिन नक्कारखाने में तूती की तरह उनकी आवाज कोई सुनने को तैयार नहीं है।

इसलिए अगर इस आंदोलन को शहर की जनता, व्यापारी या फिर और राजनेता अगर चलाना चाहते हैं तो जिला बनाओ अभियान समिति को डिसोल्व कर बहुत थोड़े मगर जिम्मेदार लोगों की एक एक्शन कमेटी बनाई जाने की जरूरत है। जो सुझावों पर ठोस निर्णय लेकर इस आंदोलन को कोई दिशा दे सके ? वरना समिति की बैठकों की नौटंकी का तमाशा देखते रहिए। इस समिति के भरोसे सूरतगढ़ को जिला बनाने का ख्वाब मुंगेरीलाल के हसीन सपने जैसा ही बना रहने वाला है। जिला बनाओ अभियान समिति की भूमिका को लेकर अंत में दुष्यंत की इन पंक्तियों के साथ बात को खत्म करता हूं।

पक गई हैं आदतें बातों से सर होगी नहीं।
कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं।।

इन ठिठुरती उँगलियों को इस लपट पर सेंक लो।
धूप अब घर की किसी दीवार पर होगी नहीं।।

बूँद टपकी थी मगर वो बूंदों बारिश और है।
ऐसी बारिश की कभी उन को ख़बर होगी नहीं।।

आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मा’लूम है।
पत्थरों में चीख़ हरगिज़ कारगर होगी नहीं।।

आप के टुकड़ों के टुकड़े कर दिए जाएँगे पर।
आप की ताज़ीम में कोई कसर होगी नहीं।।

सिर्फ़ शाइ’र देखता है क़हक़हों की असलियत।
हर किसी के पास तो ऐसी नज़र होगी नहीं।।

राजेंद्र पटावरी, उपाध्यक्ष- प्रेस क्लब,सूरतगढ़।

    

One response to “जिला बनाओ अभियान का सच : जिम्मेदारों की नकारात्मक भूमिका (पार्ट-1)”

  1. उमाशंकर यादव avatar
    उमाशंकर यादव

    सो फीसदी सत्य कहा है छोटे भाई 🙏🏻

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