गैर जाट वर्सेज जाट की रणनीति फ़ैल,हुआ साइड इफ़ेक्ट,भादू-मील नें बिगाड़े समीकरण !

सूरतगढ़। सूरतगढ़ विधानसभा से वर्तमान विधायक रामप्रताप कासनिया को टिकट देने के पीछे की सबसे बड़ी भाजपा की गैर जाट के मुकाबले जाट प्रत्याशी को..

सूरतगढ़। सूरतगढ़ विधानसभा से वर्तमान विधायक रामप्रताप कासनिया को टिकट देने के पीछे की सबसे बड़ी भाजपा की गैर जाट के मुकाबले जाट प्रत्याशी को उतारने की रणनीति थी। लेकिन भाजपा आलाकमान का यह फैसला अब फेल होता दिख रहा है। क्यूंकि तमाम प्रयासों के बावजूद सूरतगढ़ विधानसभा का मुकाबला कांग्रेस प्रत्याशी गेदर के पक्ष में जाता दिख रहा है। सट्टा बाजार में गेधर की जीत के भाव गिरकर 15 पैसे तक जा पहुंचे हैं जिसका मतलब है कि सटोरिये इस मुकाबले को एक तरफा मान रहे है।

भाजपा और कासनिया अब तक अपने तमाम प्रयासों के बावजूद इस मुकाबले को अगर गैर जाट वर्सेस जाट बनाने में कामयाब नहीं हो पाए हैं तो इसके पीछे 2 प्रमुख वजह भी है। इसमें पहली वजह है चुनाव मैदान में कई जाट प्रत्याशियों का उतरना। सूरतगढ़ विधानसभा के मुकाबले को भाजपा गैर जाट वर्सेस जाट नहीं बना पा रही है तो इसकी एक वजह चुनाव में तीन अन्य जाट प्रत्याशियों का उतरना भी है।

पूर्व विधायक राजेंद्र भादू जो इलाके की राजनित्ति के प्रमुख परिवार से आते है निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरे हैं तो दूसरी और उनके भाई महेंद्र भादू भी बसपा की टिकट पर चुनाव मैदान में है। इन दोनों नेताओं के अलावा मिल परिवार के प्रमुख नेता और पूर्व जिला प्रमुख पृथ्वीराज मिल भी जननायक जनता पार्टी के बैनर तले चुनाव लड़ रहे हैं। क्योंकि यह तीनों जाट नेता इलाके की राजनीति में गहरा प्रभाव रखते हैं और साथ ही साथ जाट परिवारों के साथ उनके राजनीतिक और पारिवारिक संबंध भी है। ऐसे में इलाके के जाट वोटर के लिए किसी भी एक प्रत्याशी के साथ लामबंद होना संभव नहीं रहा है। अपने-अपने व्यक्तिगत संबंधों के चलते यह सभी जाट नेता जाटों के वोट बैंक में बटवारा करने में कामयाब हो रहे हैं। जिसका नुकसान कासनिया को होना तय है।

इसके अलावा क्योंकि राजेंद्र भादू तो खुद बीजेपी से जुड़े हैं और भाजपा की टिकट पर विधायक भी रह चुके हैं। ऐसे में भादू को जितना वोट मिलेगा उसमे एक बड़ा हिस्सा भाजपा के कोर वोटर का ही होगा। ऐसे में भाजपा और कासनिया को प्रत्यक्ष तौर पर बड़ा नुकसान हो रहा है जिसका खामियाजा कासनिया को भुगतना ही पड़ेगा।

कासनिया के 5 साल के कार्यकाल से खुश नहीं जाट वर्ग

कासनिया गेदर के मुक़ाबले का गैर जाट वर्सेस जाट मुक़ाबले में तब्दील नहीं होने की दूसरी प्रमुख वजह है कासनिया का विधायक के रूप में पिछले 5 साल का कार्यकाल। पिछले कार्यकाल में विधायक कासनिया के रवइये के चलते बड़ी संख्या में जाट नेता और परिवार फिलहाल नाराज चल रहे हैं। अपने कार्यकाल में कासनिया नें मदद की उम्मीद में पहुंचे अनेक परिवारों के काम नहीं करवाए। वहीं राजनीति के चलते कई मामलों में कासनिया नें विपक्षी जाटों को घेरने का भी काम भी किया। इसी वजह से अब बड़ी संख्या में जाट परिवार कासनिया के खिलाफ खड़े दिख रहे है। इन परिवारों का मानना है कि जब कासनिया को जरूरत नहीं थी तब कासनिया जाटों के कोई काम नहीं आये और अब जब जरूरत आन पड़ी है तो जाटों से वोट की मांग कर रहे है। इस वजह से कई जाट नेता तो कासनिया का खुलकर विरोध कर रहे हैं और कांग्रेस प्रत्याशी डूंगरराम गेदर के खेमे में खड़े दिख रहे है।

गैर जाट वर्सेस जाट फॉर्मूले से टिकट वितरण का हो रहा साइड इफेक्ट

यहां यह भी गौरतलब है कि गैर जाट वर्सेस जाट के फॉर्मूले से टिकट वितरण का भाजपा को साइड इफेक्ट भी हो रहा है। क्योंकि लम्बे समय से भाजपा में गैर जाट प्रत्याशी को टिकट देने की मांग उठ रही थी। लेकिन कांग्रेस द्वारा गेदर को टिकट देने की घोषणा के बाद भाजपा नें गैर जाट के मुकाबले में जाट प्रत्याशी को मैदान में उतरने की रणनीति के तहत कासनिया को टिकट दे दी। जिसके चलते आम जनता में और अंदरखाने भाजपा में भी टिकट का विरोध हो रहा है। भाजपा के अगली पीढ़ी के टिकट के दावेदार गैरजाट नेताओं को कासनीया की विदाई में ही अपना भविष्य नज़र आ रहा है इसलिये वे औपचारिकता मात्र के लिए चुनाव प्रचार में दिख रहे है।

मूल ओबीसी वर्ग मतदाता हो रहा गेदर के पक्ष में लामबंद

टिकट कटने के बाद मील परिवार के रूप में जाट नेताओं के कासनिया को समर्थन से उल्टा रिएक्शन हो रहा है। इस बेमेल कॉम्बिनेशन का एक असर ये हुआ है कि एक तरफ जाट विरोध का वोट गेदर के पक्ष में जा खड़ा हुआ है वही मूल ओबीसी समाज भी गेदर के पक्ष में लामबंद हो गया है। मूल ओबीसी जातियां जिनमे कुम्हार प्रजापति समाज के अलावा नाई, सुथार, लुहार, सोनी जैसे कई समाजों का गेदर के पक्ष में झुकाव कासनिया के लिए खतरे की घंटी बन गया है।  

                  कुल मिलाकर भाजपा का गैर जाट के मुकाबले में जाट प्रत्याशी को मैदान में उतारने का फैसला अभी कामयाब होता नहीं दिख रहा है। वैसे अगर सूरतगढ़ विधानसभा के वोटर के जातीय समीकरण को देखें तो यह साफ नजर आता है कि भाजपा के पक्ष में अगर जाट वोट बैंक का शत प्रतिशत ध्रुवीकरण हो जाए तो भी फिलहाल गेदर की चुनौती पर पाना कासनिया के लिए आसान नहीं है।  

                 

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