सूरतगढ़। उपजिला चिकित्सालय के आर्थोपीडिक डॉक्टर भारत भूषण जांगिड़ इन दिनों विवादों में है। सोमवार को छुट्टी रखने का विरोध होने पर डॉक्टर जांगिड़ कथित तौर पर अपना इस्तीफा दे चुके है। इसके बाद से उनके कुछ समर्थक या अंधभक्त डॉ साहब को विक्टिम के रूप में पेश कर रहे है। ये लोग डॉ साहब की सोमवार की छुट्टी लेने विरोध करने वाले लोगों पर राजनीति करने का आरोप जड़ रहे हैं। लेकिन उन्हें शायद पता नहीं है कि हॉस्पिटल को राजनीति का अड्डा बनाने में सबसे बड़ा योगदान डॉक्टर साहब का ही है। डॉ साहब के शुभचिंतक चाहे तो इस बात की तस्दीक चिकित्सालय के कार्यरत अपने किसी परिचित साधारण कर्मचारी से कर सकते है।
पिछले कई सालों में यह पहला ही मौका है ज़ब डॉ साहब को उनकी ही राजनीति महंगी पड़ गई है। वरना अब तक डॉ साहब राजनितिक कलाबाजीयां कर हॉस्पिटल की व्यवस्थाओं के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले कई लोगों कानूनी मुकदमों में उलझा चुके है। ऐसे लोगों में आम आदमी ही नहीं पत्रकार भी शामिल है। कुछ लोगों को तो डॉ साहब की तिल को ताड़ बनाने की राजनीति के चलते जैल की हवा तक खानी पड़ी है।
इसके बावजूद डॉ जांगिड़ के कुछ नादान समर्थक उन्हें ऐसे शानदार व्यक्तित्व के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं जैसे कि इस शहर के लोग उनके बारे में जानते ही नहीं है। डॉक्टर साहब की ये खासियत सारा शहर जान ही चुका है कि डॉ साहब भले ही मानवता की सेवा के प्रोफेशन में हो, लेकिन मरीजों की सेवा से उनका दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है। मरीजों की सेवा के नाम पर लाखों रुपए का वेतन लेने वाले डॉक्टर साहब मरीजों को गवर्नमेंट हॉस्पिटल की बजाय अपने निजी अस्पताल में देखना ज्यादा पसंद करते है ?
यही वजह है कि सोमवार को ज़ब अस्पताल में सबसे ज्यादा मरीज ईलाज की उम्मीद में आते है, तब डॉक्टर साहब विभागीय नियमों को ठेंगा दिखाकर छुट्टी रख लेते है और अपने एक क़ारिंदे को अपने ड्यूटी कक्ष के बाहर बिठा देते हैं। जो छुट्टी की बात कहकर मरीजों को डॉक्टर साहब के प्राइवेट हॉस्पिटल में रैफर करता रहता है। डॉ साहब को सोमवार को इन गरीब मरीजों से होने वाली कमाई का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि ज़ब उनसे सोमवार को सरकारी नियमों के तहत चिकित्सालय में ड्यूटी के लिए कहा गया तो उन्होंने गरीब मरीजों की इलाज की जगह अपनी प्राइवेट प्रैक्टिस को तरजीह दी और कथित इस्तीफा दे डाला।
यहां यह कहना भी गलत नहीं होगा कि डॉक्टर साहब का लालच ही वह वजह है जिसकी वजह से हॉस्पिटल में विधायक कोटे से मिली 15 लाख की C-ARM मशीन पिछले 3 सालों से कबाड़ बन रही और मरीजों की टूटी फूटी हड्डियों के ऑपरेशन नहीं हो पा रहे हैं। जबकि डॉ साहब प्राइवेट हॉस्पिटल में धड़ाधड़ ऑपरेशन किये जा रहे है। वैसे मशीन से ऑपरेशन नहीं होने के लिए मशीन के नीचे रखने वाली मेज नहीं होने का कारण बताया जा रहा है जो हैरान करने वाला है। वहीं हॉस्पिटल के गरीब मरीजों के प्रति डॉक्टर साहब का रवैया कैसा रहता है इसका अंदाजा तो आप सोशल मीडिया पर इन दिनों तैर रहे वीडियो और कमेंट्स से लगा सकते है।
जहाँ तक डॉक्टर साहब के शानदार व्यक्तित्व की बात है तो उनका हॉस्पिटल भी उनके शानदार व्यक्तित्व का आईना है। राजकीय चिकित्सालय में पिछले पांच दशक में सैकड़ो डॉक्टर आए और गए। इनमें से ज्यादातर डॉक्टर्स को हमने सरकारी सेवा में रहते हुए निजी प्रैक्टिस करते देखा है। जो डॉक्टर नॉन प्रैक्टिस अलाउंस नहीं लेते उन्हें निजी प्रैक्टिस की छूट भी है। परन्तु अब तक हमने डॉक्टर्स को प्राइवेट प्रैक्टिस अपने निवास स्थान पर ही करते देखा हैं। लेकिन सूरतगढ़ के इतिहास में डॉक्टर भारत भूषण पहले ऐसे डॉक्टर हैं जो निवास स्थान की जगह खुल्लम-खुल्ला अपना प्राइवेट हॉस्पिटल चला रहे है। यही नहीं इस अस्पताल में धड़ल्ले से मरीजों की जांच और दवाईयों का कारोबार किया जा रहा है। यह डॉक्टर साहब का राजनीतिक रसूख ही है जिसकी वजह से चौड़े धाड़े यह गोरखधंधा चल रहा है। यह तो इस शहर की जनता भली है कि उन्होंने डॉ साहब की तमाम कारगुजारियों की अनदेखी कर डॉक्टर साहब को भगवान का दर्ज़ा दे रखा है वरना डॉ साहब के इस हॉस्पिटल पर कब का ताला जड़ चुका होता।
कुल मिलाकर डॉ साहब को इस शहर और इसकी आम जनता का शुक्र मनाना चाहिये, जों उनकी तमाम खामियों की अनदेखी कर अभी भी उन्हें हॉस्पिटल में रखना चाह रही है। वैसे मरीजों को ही रही परेशानी के मद्देनज़र डॉ साहब हॉस्पिटल ज्वाइन करे तो उनका स्वागत है। पर हमारा मानना है कि डॉ साहब अगर अपनी भूल सुधारना चाहतें है तो इसके लिए सबसे पहले अपना अहंकार त्याग करें। इसी से उनका और इस शहर की जनता का भला होगा।
- राजेंद्र पटावरी, पूर्व अध्यक्ष -प्रेस क्लब, सूरतगढ़।

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