सूरतगढ़। वार्ड नंबर-43 से कांग्रेसी पार्षद कृष्ण बेनीवाल उर्फ किनिया के बीती रात से लापता होने के मामले का उसके भाई विकास बेनीवाल के सोशल मीडिया पर वीडियो जारी करने के साथ ही पटाक्षेप हो गया है। दरअसल यह पूरा प्रकरण शुरुआत से संदिग्ध नजर आ रहा था क्यूंकि किनिया और उसके भाई की बरामदगी को लेकर बीती रात से जो घटनाक्रम चल रहा था, उसमें विरोधाभास नज़र आ रहा था। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस प्रकरण में कांग्रेस का रिएक्शन हैरान करने वाला था। किसी भी राष्ट्रीय पार्टी का पार्षद पुलिस थाना में विपक्षी पार्टी के लोग अग़वा कर ले जाये यह सामान्य घटना नहीं है। ऐसी घटना होने पर किसी पार्टी का क्या रिएक्शन होता इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं।
इस प्रकरण में होना तो यह चाहिए था के घटना के तुरंत बाद ही विधायक लूणकरणसर थाने में ही धरना लगा देते ? मगर विधायक मौक़े पर पहुंचे तक नहीं। अगर यह भी मान लिया जाए कि विधायक घटनास्थल से बहुत दूर थे और कई घंटे बाद भी पहुंचने की स्थिति में नहीं थे, तब भी विधायक लूणकरणसर थाना क्षेत्र से भी कांग्रेस नेताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं को एक्टिव कर सकते थे। वहीं विधायक अगर प्रयास करते तो सूरतगढ़ से भी पार्टी के बड़े नेता रात को ही लूणकरणसर पहुंचकर आंदोलन खड़ा कर सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ !
इसके अलावा जब रात को किनिया की मां और बहन सिटी थाने पर पहुंची, तब भी कांग्रेस के किसी भी बड़े नेता या कार्यकर्ता का मौजूद न होना इस बात का इशारा था कि कांग्रेस इस प्रकरण को गंभीरता से नहीं ले रही थी ? इसके बाद सुबह 10 बजे कांग्रेस की तरफ से उपखंड कार्यालय पर धरना प्रदर्शन का नाटक तो जरूर किया गया, लेकिन वहां भी कांग्रेस का कोई बड़ा नेता मौजूद नहीं था।
बाद में कुछ देर के लिए विधायक डूंगरराम गेदर मौक़े पर जरूर पहुंचे, लेकिन पार्षद के लापता होने के 16 घंटे से ज्यादा का समय बीतने के बावजूद विधायक ने धरने पर बैठना उचित नहीं समझा …। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान कांग्रेस नेताओं की भूमिका से यह साफ हो चुका था कि कांग्रेस नेताओं को सच्चाई का पता था। वे तो बस रस्म अदागयी के लिए वहां मौजूद थे।
इसके बाद विधायक के मीडिया को दिए गए बयानों से तो यह पूरी तरह साफ ही हो गया कि मामले में कुछ लोचा है। अपने एक बयान में विधायक ने कहा कि किनिया उनके कंट्रोल में है ! एक दूसरे बयान में उन्होंने यह भी कहा कि किनिया वोट भी डालेगा ! अब सवाल यह है कि कांग्रेस का पार्षद यदि विपक्षियों के पास है तो विधायक कितने कॉन्फिडेंट कैसे हो सकते थे ? विधायक के इस बयान का अर्थ यही था कि किनिया जहां भी है उसकी जानकारी विधायक को थी और किनिया विधायक खेमे के नियंत्रण में है। मतलब साफ है कि विधायक और पार्टी के दूसरे नेता इस प्रकरण में सक्रिय न होकर बस खानापूर्ति कर रहे थे।
दूसरी और घटनास्थल पर मौजूद कीनिया के दोस्तों के बयानों पर भी गौर किया जाए तो वह भी गोल मोल नज़र आते है। एक बयान में उन्होंने किनिया के प्रतिद्वंद्वी रहे भाजपा से जुड़े लोगों के एक गाड़ी में लूणकरणसर पहुंचने का दावा किया है। इन बयानो के आधार पर यह माना जा रहा था कि किनिया को ले जाने में विपक्षी लोगों का हाथ है। उनका यह कहना कि ज़ब राजाराम गोदारा थाने में पहुंचे तब जिन लोगों ने उन्हें बैरिकेड लगाकर रोका था वे किनिया और उसके भाई को गाड़ी में बिठाकर ले गए।
किनिया के दोस्तों के बयानों के आधार पर तो किनिया के परिजनों को अपनी शिकायत में इन नामों और घटनाक्रम का जिक्र करना चाहिए था। लेकिन शिकायत में इन नामों का कोई जिक्र नहीं होने से यह साफ हो गया कि यह मामला पूरी तरह से फर्ज़ी है। शाम होते होते कीनिया के भाई ने वीडियो जारी कर खुद ही इस मामले का पटाक्षेप जरूर कर दिया है, पर सवाल खड़ा होता है कि आखिर इस ड्रामा की आखिर वजह क्या रही ?
कहीं कांग्रेस में कलह तो नहीं है इस ड्रामे की वजह ?
कांग्रेस पार्षद कीनिया और उसके भाई के लापता होने से जुड़े प्रकरण को लेकर अलग-अलग क्यास लगाये जा रहे हैं। नगरपालिका चुनाव के परिणाम की घोषणा से लेकर अब तक की घटनाक्रम पर गौर करें तो यह मामला कांग्रेस के भीतर कलह की ओर इशारा करता है ! कुछ लोगों का मानना है कि निर्दलीय परमेश्वरी देवी गोदारा को अध्यक्ष प्रत्याशी बनाने के बाद खुद के लिए कीनिया वाइस चेयरमैनी की मांग कर रहे थे।
इसके साथ ही एक चर्चा यह भी है कि कांग्रेस द्वारा परमेश्वरी देवी गोदारा का नाम करने से पार्षदों में नाराजगी थी और कीनिया इसके विरोध में थे। दरअसल इन दोनों वजहों में से वजह जो भी रही हो बड़ी बात ये है कि किनिया बाड़ाबंदी से बाहर रहकर कांग्रेस के लिए सरदर्द पैदा कर रहे थे। जिससे कांग्रेस नेताओं को लगा कि किनिया को खुला छोड़ना ठीक नहीं होगा और कीनिया को काबू करने के लिए यह ड्रामा रचा गया हो !
इन सबके अलावा यह भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस खेमे से जुड़े 2 निर्दलीय पार्षदों को प्रमाण पत्र नहीं मिले थे और प्रशासन इन पार्षदों को छुट्टी और बाहर होने के बहाने शपथ दिलाने में आनाकानी कर रहा था। इसी को देखते हुए कांग्रेस गुट ने प्रशासन को एक्टिव करने लिए यह ड्रामा रचा और प्रशासन पर दबाब बनाकर दोनों पार्षदों को शपथ दिलाने में कामयाब हो गए। बहरहाल सच क्या है इस बात का खुलासा तो आने वाले दिनों में ही होगा मगर अगले दो दिन शहर की राजनीति में बेहद महत्वपूर्ण होंगे इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता।
– राजेंद्र पटावरी,पूर्व अध्यक्ष-प्रेस क्लब, सूरतगढ़।
