सूरतगढ़। शहर का नगरपालिका प्रशासन और विकास के वादे पर चुने गए पार्षद अगर अगले पांच साल तक 24×7 भी काम करें तो इस शहर में इतनी समस्याएं है कि वे कम नहीं होगी। मगर फिलहाल इस शहर में सबसे बड़ा सवाल ये है कि नगरपालिका के वाइस चेयरमैन को बैठने को कुर्सी और कमरा मिलना चाहिए या नहीं ? कुछ दिनों से यह सवाल शहर की राजनीतिक फिजाओं में तैर रहा है। नगरपालिका एक्ट के कुछ जानकर बताते हैं कि वाइस चेयरमैन को कुर्सी और अलग कमरा मिले यह एक्ट में कहीं नहीं लिखा है ? वहीं कुछ लोग इस ख्याल के है कि वाईस चेयरमैन एक तरह से पार्षद ही होता है। वाइस चेयरमैन के पास कोई ताक़त नहीं होती। इन लोगों का दावा अगर सही माना जाये तो कांग्रेस को यह मांग ही नहीं उठानी चाहिए थी।
राजनितिक नजरिये से देखें तो कुछ हद तक इसे स्वीकारा जा सकता है। लेकिन प्रकरण मे एक दूसरा पक्ष भी है। सबसे पहली बात तो ये है कि वॉइस चेयरमैन का चुनाव पार्षदों के वोट से होता है। ऐसे मे उसके अस्तित्व को बिल्कुल नकारना एक तरह से उस लोकतांत्रिक व्यवस्था को नकरना है, जिसके तहत अध्यक्ष का भी चुनाव हुआ है। इसके साथ ही बिना अधिकार के पद की वैल्यू नहीं होने का तर्क भी बेमानी ही है। क्यूंकि देश मे ही ऐसे अनेक पद है जिनके पास अधिकार नहीं है, मगर संवैधानिक व्यवस्था के चलते उनकी पदीय गरिमा सर्वोच्च है। भारत के राष्ट्रपति का पद भी इसी का एक उदाहरण है।
दूसरा एक तथ्य यह भी है कि कांग्रेस के पिछले बोर्ड में राजनीतिक कारणों से ही सही बनाई गई वॉइस चेयरमैन और पार्षदों के बैठने की जो व्यवस्था बनाई गई थी, उसे एकाएक समाप्त करने की आखिर क्या जरूरत थी ? हालांकि सच ये भी है कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद इस कक्ष पर महिला पार्षद कक्ष की प्लेट भी लगाई गई थी। लेकिन चुनाव नतीजे आने से ठीक पहले महिला पार्षद कक्ष में राजस्व शाखा शुरू करना खुद सत्ता पक्ष को कटघरे में खड़ा करता है।
भले ही इस मामले में सत्ता पक्ष कमरे नहीं होने या फिर एक्ट में व्यवस्था नहीं होने का लाख दावा करे मगर यह विवाद खुद सत्ता द्वारा विपक्षी पार्षदों को प्रताड़ित करने का उपक्रम ही प्रतीत होता है ? यहाँ एक सवाल यह भी है कि जनता के चुने हुए नुमाइन्दे जिनमे महिलाओं की संख्या अच्छी खासी है अगर पालिका कार्यालय में बैठने के लिए एक स्थान की डिमांड अगर कर रहें है तो इसमें कुछ गलत नहीं है ?
इस मामले में चेयरमैन ज्योति कंवर के प्रतिनिधि सुरेन्द्र राठौड़ कह रहें है कि कांग्रेसी पार्षद भी चेयरमैन कक्ष में बैठ सकते है। यह बात कहने में तो ठीक है लेकिन अगर कुछ ही कांग्रेसी पार्षदों ने ही चेम्बर में बैठना शुरू कर दिया तो खुद चेयरमैन के लिए काम कर पाना मुश्किल हो जायेगा ! जिसकी कल्पना अभी चेयरमैन या उनके नुमाईंदो को नहीं है।
बहरहाल आज इस मामले कांग्रेस ने विरोध प्रदर्शन की घोषणा की है। अब देखना होगा कि अपने कार्यकाल की इस पहली चुनौती का सामना अध्यक्ष ज्योति कंवर और उनके पति सुरेंद्र राठौड़ किस तरह से करते है। इस मामले में नियम नहीं होने का बहाना बनाकर गेंद ईओ के पाले में डालकर वे बच नहीं सकते। वैसे भी नगरापालिका में नियमों से कितने काम होते है ये कौन नहीं जानता ! बेहतर होगा कि ज्योति कंवर और सुरेन्द्र राठौड़ विपक्षी पार्षदों के साथ बैठकर इसका कोई सकारात्मक हल निकाले। राजनीति में आगे वहीं बढ़ता है जो सबको साथ लेकर चलता है यह बात सुरेन्द्र राठौड़ जितनी जल्दी समझ लेंगे उतना ही बेहतर है।
एक और बात, इस मामले में सत्ता पक्ष से जुड़े कुछ नेता वाईस चेयरमैन और पार्षदों के लिए कक्ष का विरोध का दिखावा कर रहें है। मगर सच्चाई ये है कि वॉइस चेयरमैन कक्ष के विरोध के बहाने ये लोग खुद को चेयरमैन का वफादार साबित कर बस अपना उल्लू सीधा करना चाहते है। इसलिये नवनिर्वाचित चेयरमैन को अपने स्वविवेक से इस मामले में निर्णय करना चाहिए। एक बेहद घृणित और चर्चित बीमारी के बारे में कहा जाता था कि बचाव ही उपचार है। अपने आस पास पनप रही इन बीमारियों को चेयरमैन और उनके प्रतिनिधि जितनी जल्दी समझ लेंगे उतना ही उनका राजनितिक जीवन लम्बा होगा।
–राजेन्द्र पटावरी, पूर्व अध्यक्ष-प्रेस क्लब, सूरतगढ़।
