सूरतगढ़। शहर के वार्ड-3 व 26 के पट्टों की मांग को लेकर चल रहा आंदोलन आखिर समाप्त हो गया। मांगे पूरी हो या नही आंदोलनो की नियति समाप्त होना है। लेकिन पूर्व विधायक रामप्रताप कासनिया के कोरे आश्वासन पर 40 दिनों से चल रहे इस ऐतिहासिक आंदोलन का समापन निराश करने वाला रहा।
दरअसल यह बात किसी से छुपी नही है कि ज़ब कांग्रेस, माकपा सहित भाजपा के भी तमाम नेता पट्टे देने के पक्ष में थे, उस समय अकेले कासनिया ही थे जिन्होंने मंत्री खर्रा से उपखंड अधिकारी जयप्रकाश मीणा को फोन कर पट्टे देने पर रोक लगवाई थी। ”वार्ड-3 और 26 में लोगों ने करोड़ों रुपए के प्लॉटों पर कब्जा कर रखा है इन्हे कैसे पट्टे दे सकते है” मंत्री खर्रा के मुंह में ये शब्द ठूंसने वाले भी कासनिया ही थे। कासनिया अगर मंत्री खर्रा को गुमराह नहीं करते तो ये आंदोलन करीब एक महीने पूर्व ही समाप्त हो जाता। क्यूंकि संघर्ष समिति और नगरपालिका ईओ के बीच हुई वार्ता में तो इन पट्टों के जारी करने पर आंदोलन समाप्त करने की सहमति बन चुकी थी।
इसके अलावा कौन नही जानता है आंदोलन को कमजोर करने के लिए इन वार्डों के लोगों को पट्टे नही मिलने और कब्ज़े के मकानों को तोड़ने का खौफ भी दिखाने वाले भी नेताजी के ही समर्थक थे ताकि धरनास्थल पर भीड़ नहीं जुट सके। इस खौफ का अंदाजा आप इस बात से आप लगा सकते है कि भाजपा से जुड़े एक नेताजी जो पट्टे के लिए पिछले कई सालों से भटक रहे थे उन्होंने तो आंदोलन की तरफ झांकना ही बंद कर दिया।
इतना सब कुछ जानने समझने के बावजूद संघर्ष समिति का उन्ही नेताओं से महज आश्वासन लेकर आंदोलन समाप्त करना बेहद अफ़सोसजनक है। शर्मिंदगी की बात यह भी है कि पूरे आंदोलन के कासनिया को गरियाने वाले कुछ नेता भी उस वक़्त मंच पर दंडवत मुद्रा में थे। ये नेता 40 दिन बाद नेताजी के मंच पर आकर आश्वासन देने पर लहालौट थे। संघर्ष समिति के इस कदम ने आंदोलन से ईमानदारी से जुड़े नेताओ चाहे वह विधायक गेदर हो या फिर पूर्व विधायक भादू या फिर दूसरे नेता जो लगातार पट्टे जारी करवाने को लेकर प्रयास कर रहे थे, उनके सभी प्रयासों पर न केवल पानी फेर दिया है बल्कि आंदोलनों का ईमानदारी से साथ देने वाले लोगों को सोचने पर मजबूर भी कर दिया है।
कासनिया के दबाब में व्यापारी नेताओं ने किया आंदोलन का सौदा
बताया जा रहा है कि कासनिया समर्थकों के दबाब और अपने निजी स्वार्थो के चलते शहर के कुछ चापलूस व्यापारी नेताओं ने आंदोलन के इस अंतिम दृश्य की पठकथा लिखी थी। इन नेताओं ने ही संघर्ष समिति पर दबाब बनाया और कासनिया के कोरे आश्वासन पर आंदोलन समाप्त करवा गत 40 दिनों से चल रहे इस पवित्र आंदोलन को अपवित्र कर दिया। इन नेताओं ने कासनिया से महज आश्वासन ही नही दिलाया, बल्कि उन्हें साफा पहनाकर कासनिया का इस तरह सम्मान किया मानो पीड़ित लोगों को पट्टे मिल ही गये हो। बेशर्मी की मोटी खाल ओढ़े एक नेताजी तो साफा पहनाकर यूँ फोटो खिंचवा रहे थे जैसे कि पट्टा उन्हें ही मिला हो। ये और बात है कि साफा नेताजी नही बल्कि कासनिया के समर्थक ही साथ लेकर आये थे।
यहां मजेदार बात ये है कि ज़ब संघर्ष समिति ने सेन धर्मशाला में 12 जनवरी को पब्लिक मीटिंग कॉल की थी उस समय इन्ही व्यापारी नेताओं ने धरने से लेकर बाजार बंद करने जैसी थोथी घोषणाए कर खूब गाल बजाये थे। इन व्यापारी नेताओं की वीर रस से भरी इन बातों के बहकावे में आकर समिति ने नगरपालिका पर अच्छे भले चल रहे धरने को महाराणा प्रताप चौक पर शिफ्ट कर दिया। आंदोलन के संयोजक प्रमोद ज्याणी यह भूल गए थे कि ये वही व्यापारी नेता है जो अपने व्यापारी साथी के साथ पुलिस दुर्व्यवहार पर पहले तो धरने का नाटक करते है, फिर उन्ही पुलिस अधिकारीयों को लड्डू खिलाकर बेशर्मी दिखाने में गुरेज नही करते। इस एक उदाहरण से कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि कितने बड़े सौदेबाज हैं ये लोग, फिर प्रमोद ज्याणी सहित संघर्ष समिति के नेताओं से इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई यह समझ से परे है।
वैसे यहां यह भी गौरतलब है कि कभी जन संघर्षों के लिए पहचाने जाने वाले इस शहर में पिछले दो दशकों में अगर कोई भी बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं हो पाया है तो इसकी एक बड़ी वजह यही कथित नेता ही है जो व्यापारिक संगठनों के मठाधीश बने बैठे हैं। कुल मिलाकर एक बार फिर इस आंदोलन ने शहर के व्यापारिक संगठनों और उनके प्रतिनिधी नेताओं की स्वार्थी राजनीति की पोल खोल कर रख दी है। ऐसे में भविष्य में आंदोलन करने वाले लोग ऐसे नेताओं से दूरी बनाए रखें यही बेहतर होगा।
40 दिन चले जन आंदोलन का हासिल ?
इस आंदोलन के समाप्त होने के साथ ही अब इस बात पर की चर्चा हो रही है कि आखिर 40 दिन चले इस आंदोलन का हासिल क्या रहा। हालांकि एकबारगी देखने पर लगता है कि 40 दिन का संघर्ष व्यर्थ रहा। लेकिन सच्चाई यह नहीं है, दरअसल यह आंदोलन का दबाब ही था कि जिस विवादित खसरा नंबर-323 की वजह से पिछले 3 साल से वार्ड के पट्टे अटके हुए थे, प्रशासन उसका सीमा ज्ञान करवाने पर मजबूर हुआ। जिसके चलते वार्ड के लोगों को पट्टा मिलने का रास्ता खुला। दूसरा इस आंदोलन और प्रमोद ज्याणी की वजह से ही वार्ड नंबर 3 के खसरा नंबर 325 में बसी कॉलोनी की सुओ मोटो की कार्रवाई हुई और इस कॉलोनी के पट्टे मिलने शुरू हुए। यह पट्टे भी करीब 3 साल से लटके हुए थे। आंदोलन की वजह से इस कॉलोनी के करीब एक दर्जन लोगों को पट्टे मिले है। यहां बता दें कि ये वही पट्टे हैं जिनको बनाने के लिए लाखों रूपये के सौदे पूर्व अध्यक्ष ओमप्रकाश कालवा के कार्यकाल में हुए थे। लेकिन तब ईओ पूजा शर्मा के इंक़ार के चलते ये पट्टे नहीं बन सके। साफ है कि अब इस आंदोलन की वजह से दर्जनों लोगों के लाखों रुपए भी बच गए।
इसके अलावा पिछले 40 दिनों से चल रहे इस आंदोलन का सबसे बड़ा हासिल प्रमोद ज्याणी के रूप में काफ़ी हद तक एक ईमानदार नेता मिलना है। जिस दौर में शहर के बड़े बड़े नेताओं के लिए कुछ घंटे का धरना लगाने में पसीना छूट जाता है, उस दौर में प्रमोद ज्याणी 40 दिन तक दिन और रात आंदोलन को खींच ले जाते हैं यह कोई छोटी बात नहीं है। यह भरोसा प्रमोद ज्याणी ने पिछले कुछ सालों में अपने व्यहवार और आचरण से पैदा किया है कि वार्ड के सैंकड़ो लोगों ने उन पर भरोसा जताया और उन्हें आंदोलन की कमान सौंप दी।
संयोजक के रूप में ज्याणी ने पूरी ईमानदारी और शिद्दत से इस आंदोलन की अगुवाई की। इसी वजह से शहर के प्रत्येक जागरूक व्यक्ति का आंदोलन से जुड़ाव हुआ। हर आम व्यक्ति भी मन ही मन यह कामना कर रहा था कि इन लोगों को उनके जायज पट्टे मिले। आम लोगों की इसी जनभावना के चलते ही मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ही नहीं भाजपा के नेता भी आंदोलन के समर्थन में सक्रिय हुए। ज़ब मंत्री खर्रा के इंकार के बाद जब आंदोलन कमजोर होता दिखा तब जिलाध्यक्ष शरणपाल सिंह मान के नेतृत्व में भाजपा नेताओं ने कलेक्टर से मिलकर जांच कमेटी गठित करवाई। वहीं बाद में कमेटी की जांच आने के बावजूद प्रशासन सुस्त बना रहा तो विधायक डूंगर राम गेदर ने धरने पर बैठकर प्रशासन को वार्ता के टेबल पर आने के लिए मजबूर कर दिया। यह सबकुछ अगर हुआ तो प्रमोद ज्याणी की वजह से ही हुआ।
आंदोलन के अंतिम दिनों में कासनिया के दबाब में महाराणा प्रताप चौक पर धरने पर बैठने वालों में वार्ड के लोगों की संख्या भले ही कम हो गई, लेकिन तब भी पर्दे के पीछे इन लोगों का नैतिक समर्थन ज्याणी को मिल रहा था। ये और बात है कि व्यापारी नेताओं की धूर्तता और कमजोरी के चलते आंदोलन का जिस अंदाज में पटाक्षेप हुआ उसकी निराशा ज्याणी के चेहरे पर साफ नज़र आई।
बहरहाल हर आंदोलन कोई न कोई सबक देकर जाता है। प्रमोद तो निश्चित तौर पर इस आंदोलन से सबक लेंगे। लेकिन शहर की जनता को भी इस पूरे आंदोलन के दौरान शहर के नेताओं की भूमिका पर नजर डालनी चाहिए ताकि भविष्य में इस शहर का नेतृत्व अच्छे नेताओं को सौंपा जा सके।
-राजेंद्र पटावरी, सम्पादक-खबर पॉलिटिक्स।
