
शाहीन बाग पर चल रहे धरने को लेकर पिछले लंबे समय से सवाल उठाए जा रहे हैं । सरकार का मानना है कि सीएए नागरिकता देने का कानून है और एनआरसी को देश में लागू ही नहीं किया जा रहा है। इन दोनों बातों से इत्तेफाक रखते हुए भी में समझता हूं कि शाहीन बाग इस समय देश की सबसे बड़ी जरूरत है। ऐसा क्यों है इसका जिक्र हम आगे करेंगे ।पहले हम बात करते हैं कि सीएए नागरिकता देने का कानून कैसे है ? और एनआरसी को क्यों नहीं लागू करने जा रही है मोदी सरकार ? सीएए यानी नागरिकता संशोधन एक्ट लाने की पृष्ठभूमि में हमें आसाम में एनआरसी के परिणामों को देखना होगा । आसाम में एनआरसी के चलते करीब 19 लाख लोग नागरिकता रजिस्टर से बाहर हो चुके है। इनमें भी 13 लाख से अधिक हिंदू हैं। यह सरकार के उस अनुमान के ठीक उल्टा है जिसमें सरकार को लग रहा था कि एनआरसी आसाम से लाखों की संख्या में ( 50 लाख) अवैध बांग्लादेशी मुस्लिम माइग्रेंट को बाहर करने का बेहतरीन अवसर है। परंतु सरकार के परिणामों का सही अनुमान किए बगैर हड़बड़ी में लागू की गई एनआरसी ने सरकार के सामने ही धर्मसंकट खड़ा कर दिया । क्योंकि हिंदुओं की बड़ी आबादी नागरिकता रजिस्टर से बाहर होने से भाजपा का हिंदू वोट नाराज हो गया है। ऐसे में सरकार के लिए नेशनल रजिस्टर से बाहर हुए हिंदुओं को वापस मुख्यधारा में लाना बड़ा चैलेंज बन गया । क्योंकि पूर्व के नागरिकता कानून के कड़े नियमों ने आसाम के बड़ी संख्या में हिंदू समुदाय के लोगों को एनआरसी से बाहर कर दिया । इसलिए यह जरूरी था कि नागरिकता के नियमों को सरल किया जाए । यही वह कारण है जिसके लिए सीएए यानी नागरिकता संशोधन कानून लाया गया । लेकिन सरकार ने संशोधन बिल में जानबूझकर पाकिस्तान ,अफगानिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं सहित 6 धर्मों के साथ उत्पीड़न का हवाला देकर मुस्लिमों को नागरिकता नहीं देने का पेच डाल दिया। कुछ लोग सोच रहे हैं कि इस कानून को सरकार पाकिस्तान,अफगानिस्तान और बांग्लादेश के मुसलमानो को छोड़कर हिंदू व अन्य धर्म के लोगों को नागरिकता देने के लिए लाई है तो वे गलतफहमी में है । क्योंकि कांग्रेस सहित पिछली दूसरी सरकारों की तरह ही भाजपा ने भी पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने में कोई रुचि नहीं दिखाई है। जबकि ऐसे हिंदू पाक शरणार्थियों की संख्या हजारों में है जो पहले के नागरिकता नियमों के तहत भी नागरिकता पाने के हकदार हैं और उन्होंने नागरिकता के लिए आवेदन भी किया हुआ है । इस बात की सत्यता को समझने के लिए यह आंकड़ा ही बहुत है कि पिछले 6 सालों में सरकार ने पाकिस्तान के केवल 2830 ,अफगानिस्तान के 912 और बांग्लादेश से आए 172 अवैध प्रवासियों को ही नागरिकता प्रदान की है और इनमें मुसलमान भी हैं । इसके अलावा इलीगल माइग्रेंट्स को नागरिकता नही देने का एक पहलू यह भी है कि वे पहले से जनसंख्या वृद्धि से त्रस्त देश के सीमित संसाधनों में भागीदार बन जाएंगे । यही वजह है कि सरकारे अवैध प्रवासियों को नागरिकता देने में बचती रही है। कुल मिलाकर CAA के जरिये सरकार ने आसाम में एनआरसी से बाहर हुए उन लोगों को जिनका दर्जा अवैध प्रवासियों का हो चुका था , को एक तरह से राहत देने का प्रयास किया है । क्योंकि सीएए का संशोधन 31 दिसंबर 2014 को भारत में रह रहे बाहरी लोगों को इलीगल माइग्रेंट्स नहीं मानता है । जिसका सीधा सा मतलब है कि आसाम में एनआरसी से बाहर हुए लोग अब अवैध अप्रवासी नहीं है । इसके अलावा CAA में नागरिकता के लिए भारत में रहने की अवधि 11 साल से घटाकर 6 साल करने से असम एनआरसी से बाहर हुए लगभग सभी लोग नागरिकता के लिए आवेदन कर सकेंगे । इसलिए मुझे लगता है की सीएए नागरिकता देने का कानून तो है , पर यह पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश की प्रताड़ित हिंदू कम्युनिटी को नागरिकता देने की बजाय आसाम में एनआरसी से बाहर हुए विशेषकर हिंदुओं को नागरिकता देने के लिए है। यह अलग बात है कि CAA लागू करने के साथ ही 955 लोगों की शहादत और 45 सालों की लंबी लड़ाई के बाद एनआरसी लागू कराने वाले आसाम के लोग अब एनआरसी से बाहर हुए लोगों को सीएए के बहाने वापस नागरिकता देने के खिलाफ हो गए हैं । वही दूसरी ओर CAA के जरिये मुस्लिमों को नागरिकता देने से वंचित करने के भाजपा के मन्सूूबे के खिलाफ देश की पढ़ी लिखी जनता ओर अमन पसंद व संविधान में विश्वास रखने वाले बुद्धिजीवियों और एक्टिविस्टों का एक बड़ा वर्ग मुसलमानों के साथ खड़ा हो गया है ।
- राजेन्द्र पटावरी





















































































































































































































































