लोगों का प्रकृति प्रेम देश भर मे बन रहा मिसाल ?










सूरतगढ़ । दीपावली हो और पटाखे नहीं बजे, भारत मे इस बात की हम शायद कल्पना भी नहीं कर सकते है। क्यूंकि हमारे यहां दीपावली पटाखों के बगैर अधूरी है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर उम्र के लोग दीपावली को पटाखे जलाकर अपनी खुशियों को सेलिब्रेट करते हैं। लेकिन देश में कुछ गांव ऐसे भी हैं जहां दीपावली का उत्साह तो कम नहीं होता, मगर यहां पटाखों की आवाज सुनाई नहीं देती। विशेष बात ये है कि इसकी वजह कोई सरकारी आदेश या प्रशासनिक प्रतिबंध नहीं, बल्कि ग्रामीणों का बेजुबान जीवों के प्रति प्रेम और संवेदनशीलता है।
दरअसल दक्षिण भारत के तमिलनाडु के कई गांवों में लोग चमगादड़ों की सुरक्षा के लिए दीपावली पर पटाखे नहीं जलाते। यही नहीं यह कोई एक-दो साल पुरानी पहल नहीं है, बल्कि कई गांवों में यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। तमिलनाडु के मयिलादुथुरई जिले के पेरम्बूर गांव में स्थित एक विशाल बरगद का पेड़ सैकड़ों चमगादड़ों का बसेरा है। स्थानीय लोग इस स्थान को ‘वव्वाल थोप्पू’ यानी चमगादड़ों का बाग कहते हैं। इस पेड़ पर रहने वाले चमगादड़ों को ग्रामीण अपने गांव का हिस्सा मानते हैं। इसी के चलते यहां एक सदी से भी अधिक समय से लोग दीपावली के दौरान पटाखे जलाने से परहेज करते आ रहे हैं। ग्रामीणों का मानना है कि पटाखों की तेज आवाज और आतिशबाजी से पेड़ों पर रहने वाले चमगादड़ परेशान हो सकते हैं और अपना बसेरा छोड़कर दूसरी जगह जा सकते हैं। इसलिए गांव में दीपावली का त्योहार पारंपरिक तरीके से मनाया जाता है। लोग घरों में दीपक जलाते हैं, मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं और परिवार के साथ मिठाइयां बांटकर खुशियां साझा करते हैं, लेकिन आतिशबाजी से दूरी बनाए रखते हैं।
इसी तरह तमिलनाडु के काड्पाडी के नजदीक कलापट्टू गांव में भी तीन पीढ़ियों से पटाखे नहीं जलाने की परंपरा निभाई जा रही है। इस गांव के निवासी जी. संपत के मुताबिक वे ज़ब 12 वर्ष के थे, तब उनके पिता ने उन्हें पेड़ों पर रहने वाले चमगादड़ों की सुरक्षा के लिए पटाखे जलाने से मना कर दिया था। पिता की यही सीख धीरे-धीरे पूरे परिवार और गांव की परंपरा बन गई। आज कई दशक बीत जाने के बाद भी ग्रामीण इस सीख का पालन कर रहे हैं। गांव के लोगों का कहना है कि चमगादड़ों को परेशान करना उन्हें मंजूर नहीं है और वे बाहरी लोगों को भी इन जीवों को पकड़ने या नुकसान पहुंचाने की अनुमति नहीं देते।
इसके अलावा तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले के थोपुपट्टी और सामपट्टी जैसे गांवों में भी चमगादड़ों के संरक्षण के लिए आतिशबाजी से दूरी बनाई जाती है। इन गांवों के बड़े पेड़ों पर बड़ी संख्या में फल खाने वाले चमगादड़ रहते हैं। स्थानीय लोग इन्हें अपने गांव का शुभचिंतक मानते हैं। शाम के समय जब चमगादड़ों के झुंड भोजन की तलाश में पेड़ों से निकलते हैं और आसमान में उड़ते दिखाई देते हैं, तो ग्रामीणों के लिए यह नजारा आकर्षण का केंद्र बन जाता है। इन गांवों में चमगादड़ों के प्रति सम्मान इतना गहरा है कि लोग उन्हें केवल एक जंगली जीव नहीं, बल्कि अपने प्राकृतिक परिवेश का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं।
कोयंबटूर के निकट किट्टमपालयम गांव में भी चमगादड़ों के संरक्षण को लेकर सामुदायिक जागरूकता की मिसाल देखने को मिलती है। यहां वर्ष 2012 में सरकारी मिडिल स्कूल के माध्यम से बच्चों को चमगादड़ों और पक्षियों के संरक्षण के बारे में जागरूक करने का अभियान चलाया गया था। इसके बाद गांव के सैकड़ों परिवारों ने दीपावली पर पटाखे नहीं जलाने का संकल्प लिया। बच्चों ने भी इस संदेश को अपने परिवारों और आसपास के लोगों तक पहुंचाया। नतीजा यह हुआ कि अब इस गांव के लोग दीपावली पर पटाखे नहीं जलाते हैं।
हालांकि आमतौर पर चमगादड़ों को लेकर लोगों में कई तरह की गलत धारणाएं भी देखने को मिलती हैं, लेकिन तमिलनाडु के इन गांवों के लोगों ने अपने व्यवहार से दिखाया है कि त्योहार मनाने के कई तरीके हो सकते हैं और अपनी खुशी के लिए किसी दूसरे जीव को परेशान करना जरूरी नहीं है। यहां न तो दीपावली की खुशियों में कमी आती है और न ही उत्सव का उत्साह कम होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां आसमान में पटाखों की जगह चमगादड़ों के उड़ते झुंड दिखाई देते हैं और घरों के बाहर जलते दीपक त्योहार की रोशनी फैलाते हैं।
तमिलनाडु के इन गांवों की कहानी पूरे देश के लिए एक प्रेरणादायक संदेश है कि त्योहारों की असली खुशी केवल अपने घरों को रोशन करने में नहीं, बल्कि उन बेजुबानों के जीवन और आशियाने को सुरक्षित रखने में भी है, जिनका इस धरती पर उतना ही अधिकार है जितना हमारा। तमिलनाडु के गांव की इस कहानी से आप और हम भी प्रेरणा ले सकते हैं। अगर आपके आसपास के घरों में अगर कोई बुजुर्ग और बीमार व्यक्ति हैं, कोई ऐसा व्यक्ति है जो सांस के गंभीर रोग से पीड़ित है तो हमें पटाखे नहीं बजाकर संवेदनशीलता का परिचय देना चाहिए। याद रखिए खुशियां हमेशा इंटरनल होती है, अपने मजे के लिए दूसरों को परेशान करना खुशी नहीं है।
