सोशल डिस्टेंसिंग पर प्रशासन के दोहरे मापदण्ड

क्योंकि यह मामला सीधे सीधे शहर के प्रथम पुरुष यानी नगरपालिका चैयरमेन से जुड़ा हुआ है तो लॉकडाउन के दौरान और धारा 144 लागू होने के बावजूद नगरपालिका सभागार में जिम्मेदार लोगों द्वारा बड़ी संख्या में लोगो को इक्कठ्ठा करना, एडीएम साहब को सोशल डिस्टेंसिंग का उल्लंघन नही लगता है ।

विदाई समारोह मामले में 4 माह बाद भी प्रशासन की चुप्पी

सूरतगढ़। सूरतगढ़ एडीएम अशोक मीना आजकल खूब चर्चा में है । एडीएम साहब की ये खासियत है कि सोशल डिस्टेंसिग और धारा 144 के पालन का बहुत ध्यान रखते हैं। साहब को बर्दाश्त नही है कि उनके ऑफिस में कोई सोशल डिस्टेंसिंग का पालन न करे। इसका उदाहरण दो दिन पूर्व उस समय देखने को मिला जब सूरतगढ़ संघर्ष समिति से जुड़े लोग क्रमिक अनशन शुरू करने की जानकारी का ज्ञापन देने एडीएम साहेब के पास पहुंचे। समिति के गरीब सदस्यों को देखते ही एडीएम साहब को ध्यान आया कि सोशल डिस्टेंसिंग का वायोलेशन हो रहा है। सो उन्होंने बुला डाली पुलिस और समिति के दो लोगों को गिरफ्तार करवा दिया। पहले तो कहा गया कि दोनों वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे थे । फिर बाद में पता चला कि शांति भंग के आरोप में दोनों को गिरफ्तार किया गया। इसी तरह कुछ दिन पहले जब विधायक रामप्रताप कासनिया कच्ची बस्ती के कुछ लोगो के साथ साहब के कार्यालय पहुंचे तो नेताजी के साथ आई भीड़ से सोशल डिस्टेंसिंग भंग होने की आशंका भर से ही साहेब का पारा हाई हो गया और गर्म हो गए नेताजी जी पर। हालांकि गुस्से में एडीएम साहेब ये भी भूल गए कि वे एक वर्तमान विधायक से बात कर रहे हैं । उन्हें ये भी याद नही रहा की जिस सरकार का सूबे में राज है उसी के मुखिया ने कुछ महीने पूर्व एक आदेश दिया है कि अधिकारियों को जनप्रतिनिधियों से सभ्यता से पेश आना होगा । खैर अच्छी बात है कि एडीएम साहब सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल रखते हैं और इसका वाईलेशन करने वालों को सज़ा भी देते हैं । पर कई बार लगता है एडीएम साहब का सोशल डिस्टेंसिंग का फॉर्मूला सिर्फ अपने ऑफिस तक ही सीमित है। शहर में दूसरी जगहों पर इसका मजाक उड़े तो उन्हें कोई फर्क नही पड़ता और सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाने वाला अगर प्रभावशाली व्यक्ति हो तो साहब की कलम की स्याही सुख जाती है। नगरपालिका सभागार में ईओ लालचंद सांखला के सेवानिवृत्त के मौके पर सोशल डिस्टेंसिंग का किस तरह मख़ौल उड़ाया गया ,ये सब ने देखा था और इस मौके के फोटो व वीडियो सोशल मीडिया पर भी खूब प्रसारित हुए थे । होना तो ये था कि शहर में सोशल डिस्टेंसिंग की पालना कराने के सबसे जिम्मेदार अधिकारी होने के नाते वे स्वंय घटना का संज्ञान लेते । परन्तु हालात ये है कि इस मामले में शिकायत के बाद भी चार महीने हो गए हैं लेकिन साहब दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई करने की जगह जांच को ही दबाये बैठे हैं । क्योंकि यह मामला सीधे सीधे शहर के प्रथम पुरुष यानी नगरपालिका चैयरमेन से जुड़ा हुआ है तो लॉकडाउन के दौरान और धारा 144 लागू होने के बावजूद नगरपालिका सभागार में जिम्मेदार लोगों द्वारा बड़ी संख्या में लोगो को इक्कठ्ठा करना, एडीएम साहब को सोशल डिस्टेंसिंग का उल्लंघन नही लगता है । यही नही ब्लॉक कांग्रेस के विधुत विभाग कार्यालय में प्रदर्शन और भाजपा द्वारा प्रधानमंत्री के पत्र वितरण के कार्यक्रम सहित और भी कई मौके ऐसे थे जब शहर में सोशल डिस्टेंसिंग का मजाक बनता रहा पर साहेब की आंखे नही खुली । भारत में क्योंकि कानून का राज है? ऐसे में प्रशासन सोशल डिस्टेंसिंग के उल्लंघन के मामलों में कानून की अलग-अलग व्याख्या नही कर सकता है ? परन्तु एडीएम साहब हर मामले में सोशल डिस्टेंस के नियमो की अलग अलग व्याख्या करते दिख रहे हैं । ऐसे में क्या ये मान लिया जाए कि साहेब का जोर कमजोर लोगों पर ही चलता है ? या फिर ये मान लिया जाए कि साहब के सोशल डिस्टेंसिंग के नियम आम गरीब जनता के लिए है ? पैसे वालो और ताक़तवर राजनेताओं के लिए नही !

– राजेन्द्र पटावरी

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