सूरतगढ़।
हजारों साल से नर्गिस अपनी बेनूरी पर रोती है।
तब जाके होता है चमन में दीदावर कोई पैदा।।
उर्दू के मशहूर शायर अल्लामा इकबाल के इस शेर की तरह पिछले कई दशकों से शहर की राजनीति को एक दीदावर का इंतज़ार था। लेकिन अब लगता है डूंगरराम गेदर के रूप में उस दीदावर का आगमन हो चुका है। दरअसल 50000 वोटों से जीत हासिल करने वाले गैदर ने सूरतगढ़ के राजनितिक इतिहास मे ऐसा एक और कारनामा कर दिया है जिसकी कोई दूसरी मिशाल नहीं मिलती। उस दौर में ज़ब सुचिता की बात करने वाली पार्टीयां नगरपालिका चुनावों को लेकर समझौते करने में जुटी हैं। उसी समय विधायक गैदर ने एक दो नहीं बल्कि एक दर्जन से अधिक पूर्व पार्षदों के टिकट काट दिए हैं। जिनमे कुछ ऐसे भी है जिनके बिना नगरपालिका की राजनीति की कल्पना भी करना मुश्किल है। ये वही पार्षद थे जिन्होंने शहर की 100 करोड़ से भी अधिक की बेशकीमती भूमि थोड़े से लालच में लुटा दी।
इस प्रकरण में कई ऐसे मौके भी आए ज़ब गैदर के प्रतिद्वंदियों ने उन्हें घेरने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने हाईकोर्ट में रिट लगाकर विरोधियों का मुंह बंद कर दिया। इस बीच ज़ब उन्होंने प्रेस के सामने कहा कि वे एजेंडा नंबर-7 का समर्थन करने वाले पार्षदों को टिकट नहीं देगे”। तब विरोधियों ने इसे पॉलिटिकल स्टंट बताकर ख़ारिज कर दिया। इतना ही नहीं सूची की घोषणा होने तक शहर के ज्यादातर लोग यहीं मान रहे थे कि सूची में एक या दो पूर्व पार्षदों के नाम जरूर होंगे ? खासकर शहर की राजनीति में पिछले कई दशक से दबदबा रखने वाले राजाराम गोदारा व उनके परिवार की टिकट मिलेंगी। लेकिन जब गैधर का पिटारा खुला तो गोदारा परिवार के हाथ भी खाली रह गये।
कुल मिलाकर पूर्व पार्षदों की टिकट काटकर गैदर ने दिखा दिया है कि वे उन राजनेताओं में नहीं है जो किसी मुद्दे पर बयान देकर भूल जाते हैं। राजनीतिक नफा नुकसान को भुलकर लिया गेदर का यह स्टैंड इस समय शहर के राजनीतिक हल्कों में चर्चा का विषय बन चुका है। हक़ीक़त यह है कि शांत और गंभीर नजर आने वाले गैदर से इस तरह के बोल्ड फैसले की उम्मीद खुद उनकी पार्टी के बड़े नेताओं को भी नहीं थी।
शायद यही वजह है कि राजनीति में रुचि रखने वालें कांग्रेस ही नहीं बल्कि भाजपा के कट्टर समर्थक भी इस निर्णय के लिए गेदर की सराहना कर रहे हैं। शहर की 100 करोड़ से अधिक की भूमि पार्षदों के लालच के चलते लुट जाने से आमजन मे भी पार्षदों के प्रति बेहद नाराजगी थी। ऐसे मे आमजन भी इस निर्णय से खुश नज़र आ रहा है और मन ही मन गैदर को धन्यवाद भी दे रहा है। विधायक गेदर का यह मास्टर स्ट्रोक सूरतगढ़ के राजनीतिक इतिहास में एक ऐसी नजीर के रूप में दर्ज हो गया है जिसकी गूँज बहुत लंबे समय तक सुनाई देगी।
बहरहाल गैदर ने एक तरफ दागी पार्षदों की टिकट काटकर कांग्रेस में बदलाव के संकेत दे दिए हैं।वहीं पार्टी के प्रति वफादार, पढ़ें लिखें, सभ्य और पुराने परिवारों को टिकट थमाकर नई लीक खींचने का प्रयास किया है। टिकटो के बंटवारे पर गौर करें तो साफ नज़र आता है कि केवल सत्ता प्राप्त करना गैदर की प्रायोरिटी नहीं है। बल्कि वे सुचिता की राजनीति पसंद करने वाले नेता हैं। जिसकी भ्रष्टाचार और जातिवादी राजनीति से त्रस्त इस शहर को फिलहाल बहुत जरूरत है।
– राजेंद्र पटावरी,पूर्व अध्यक्ष-प्रेस क्लब, सूरतगढ़।
