सूरतगढ़। भाजपा के पूर्व विधायक रामप्रताप कासनिया जिस उद्देश्य को लेकर सूरतगढ़ आए थे वह पूरा हो गया है। नई धानमंडी और हाउसिंग बोर्ड के बीच शहर की 100 करोड़ से अधिक की बेशकीमती भूमि आख़िरकार वे अपने नाम कराने में सफल हो गये है। इसी के साथ राजनीतिक रसूख से शहर में सरकारी जमीनो की बंदरबाँट का नया कीर्तिमान कासनिया ने बना दिया है। इस मामले में उन्होंने अपने पूर्ववर्ती विधायकों और सत्ताधारियों को भी पीछे छोड़ दिया है। बड़ी बात ये है कि पूर्व सत्ताधारियों में इस मामले में थोड़ी बहुत पर्देदारी थी, लेकिन कासनिया तो खुला खेल फर्रुखाबादी खेल रहे है।
28 सालों से कासनिया की थी इस जमीन पर नजर

दरअसल नई धानमंडी और हाउसिंग बोर्ड के बीच स्थित इस बेशकीमती जमीन पर कासनिया की नज़र पिछले 28 सालों से थी। ऐसा कहने की वजह भी है। कासनिया ने ज़ब पहली बार 1995 में जाखड़ावाली स्कूल के सेमग्रस्त होने की दुहाई देते हुए भूमि की मांग की थी। तब उन्होंने मंडी समिति हनुमानगढ़ से खुद ही सूरतगढ़ में जैल के पास सेक्टर-11 में खाली पड़ी 10 बीघा भूमि की ही मांग की थी। इस पर समिति ने 22 अक्टूबर 97 को 2,06,388 रूपये जमा करवा कासनिया को भूमि आवंटन भी कर दिया था। लेकिन इसी दौरान 1995 में पुरानी धानमंडी शिफ्ट होने और 1997 तक आते आते नई धानमंडी के विकास से धानमंडी से स्टे एरिया में जमीनों की कीमत आसमान पर पहुंच गई थी। बस यहीं से कासनिया के मन में लालच हावी हो गया और उनकी टेढ़ी निगाह मंडी के विस्तार के लिए आरक्षित नई धानमंडी और हाउसिंग बोर्ड के बीच की इस 4 बीघा जमीन पर अटक गई। इसी वजह से उन्होंने पूर्व में आवंटित जमीन पर कब्जा होने का दावा कर जमीन लेने सें इंकार कर दिया।
कासनिया की नियत में खोट था इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते है कि ज़ब उन्होंने खुद ही जैल के पास स्थित जमीन की डिमांड की थी तो क्या वे जानते नहीं थे कि जमीन पर कब्ज़ा है ? इससे भी बड़ी बात ये है कि कासनिया तब विधायक थे, वे चाहते तो कब्ज़ा हटवाकर भूमि खाली करवा सकते थे। लेकिन उनकी आँख तो मंडी से लगती बेशकीमती जमीन पर थी तो वे दूसरी जमीन क्यों लेते ?
ये अलग बात है कि 1998 से 2003 तक कांग्रेस की सरकार होने से कासनिया की दाल नहीं गली। लेकिन बाद में जैसे ही भाजपा की सरकार बनी कासनिया एक्टिव हो गए। लेकिन तब तक मंडी समिति का विघटन (2002) में होने से मामला नगरपालिका को ट्रांसफर हो गया था और दुर्भाग्यवश नगरपालिका में कांग्रेस का बोर्ड था। लेकिन कासनिया ने स्वायत शासन विभाग से आदेश करवाकर 19 जून 2005 की बोर्ड मीटिंग में एजेंडा संख्या-3 के जरिये भूमि आवंटन प्रस्ताव शामिल करवा ही लिया।
मोबाइल, लाखों रूपये और दुकान के ऑफर भी डिगा नहीं पाया ईमान, इंद्र सरावगी और अग्रवाल सहित भाजपा पार्षदों ने भी किया विरोध




यह शहर का सौभाग्य था कि उस समय के बोर्ड में कांग्रेस के अधिकतर पार्षदो का ईमान ज़िंदा था। दूसरी तरफ भाजपा में भी स्वर्गीय इंद्र सरावगी, सुशील अग्रवाल जैसे रीड वाले पार्षद थे, जिन्होंने दबाब और लालच में ना आकर शहरहित में प्रस्ताव का विरोध किया। जबकि उस समय भी पार्षदों को महंगे मोबाइल (तब विधायक पुत्र के पास बीएसएनल की टेलीकॉम फ्रेंचाइजी थी), लाखों की राशि (20 लाख रूपये की चर्चा) या जमीन में एक-एक दूकान काटकर देने का ऑफर दिया गया था। लेकिन ज्यादातर पार्षद ईमान पर टिके रहे।
ऐसे में ज़ब वोटिंग हुई तो कुल 30 में से 10 पार्षदों ने ही भूमि आवंटन का समर्थन किया। इनमें राजेंद्र ताखर, परमेश्वरी देवी गोदारा, जगदीश मेघवाल,कॉमरेड मदन ओझा, श्रवण स्वामी, श्रीमती दुर्गादेवी आसेरी, मोहन सिंह, श्रीमती महबूबा परिहार, रोशन लाल शर्मा और श्रीमती संतोष बगेरिया शामिल थे। इन नामों को देखकर आप सहज़ ही अंदाजा लगा सकते है कि पूंजीवाद के आगे घुटने टेक शहरहित की अनदेखी कर ईमान बेचने वाले उस समय भी कम नहीं थे। भाजपा, कांग्रेस और निर्दलीय ही नहीं वामपंथ के कथित झंडाबरदार भी इनमें शामिल थे।
इन पार्षदों से इतर जिन 20 पार्षदों ने प्रस्ताव के विरोध में वोट किया। उनमे भाजपा के इंद्र सरावगी, सुशील अग्रवाल के अलावा भाजपा के ही स्व.सुभाष सैनी, डॉ. महावीर सारस्वत, श्रीमती उमा मोदी और खुशाल सिंह राठौड़ का नाम शामिल है।
वैसे उस समय मीटिंग में इस प्रस्ताव को गिराने में भाजपा पार्षदों के अलावा पूर्व विधायक राजेंद्र भादू, स्व. गंगाजल मील और कामरेड बलराम वर्मा के प्रयास भी रहे थे। पूर्व विधायक भादू और वर्मा ने जहाँ इस बेशकीमती जमीन को बचाने के उद्देश्श्य से शहरहित में तो वहीं पूर्व विधायक मील ने राजनितिक प्रतिद्वन्दिता के चलते ही सही पार्षदों को एकजुट करने के प्रयास किये। जिसका नतीजा यह हुआ कि बोर्ड बैठक में प्रस्ताव गिर गया।
2006 में कासनिया ने मंत्री से करवाया आवंटन, लेकिन 2015 में कोर्ट ने किया ख़ारिज


बोर्ड मीटिंग में प्रस्ताव गिरने के बाद कासनिया ने स्वायत शासन मंत्री को बोर्ड फैसले के विरुद्ध रिवीजन कर दी। जहाँ 2006 में तात्कालिक मंत्री प्रताप सिंह सिंघवी से जनभावना और नियमों को ताक मे रखकर कासनिया के स्कूल को जमीन आवंटन कर दिया। लेकिन कासनिया के सितारे तब भी गर्दिश में ही थे जिसकी वजह से यह मामला हाईकोर्ट होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक चला गया। जहाँ सन 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने मंत्री के कासनिया को जमीन आवंटन का आदेश खारिज कर दिया। हालांकि कोर्ट ने कासनिया को पूर्व में उपकारागृह के पास आवंटित और हाईकोर्ट में सुझाये गये खसरा नंबर-444/4 व 463/2 में भूमि आवंटन के प्रस्ताव को स्वीकार करने का विकल्प सुरक्षित रखा।
लेकिन कासनिया ने इस पर भी इन दोनों जमीनों में से किसी का आवंटन कराने की बजाय मौके का इंतजार करना जारी रखा। इस बीच 2018 में कासनिया विधायक बने लेकिन लेकिन सरकार कांग्रेस की होने से उन्हें 5 साल और इंतज़ार करना पड़ा।
2023 में हारकर भी कासनिया हुए मजबूत, कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई का फायदा उठा प्रस्ताव कराया पास
2023 में हुए विधानसभा चुनावों में कासनिया बुरी तरह हार गये, लेकिन भाजपा की सरकार बनने से उन्हें फिर मौका मिल गया गयी। हालांकि इस जमीन को पाने के लिए कासनिया ने किस हद तक समझौता किया इसका अंदाजा आप कांग्रेस चेयरमैन ओम कालवा की बीजेपी में एंट्री से लगा सकते है। नगरपालिका की बोर्ड बैठकों में कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए ओम कालवा ने भाजपा विधायक रामप्रताप कासनिया के साथ हमेशा दोयम दर्जे का व्यहवार किया था। जिसके चलते इन मीटिंगस में कितनी ही बार कासनिया को ख़ून का घूंट पीना पड़ा। ऐसे भी कई मौके आये ज़ब कालवा ने इस दिग्गज नेता को शर्मिंदा होकर मीटिंग छोड़कर भागने पर मजबूर कर दिया। पर मामला क्यूंकि अरबों की जमीन का था तो कासनिया ने अपने ज़मीर को मार कर कालवा से हाथ मिला लिया।
चेयरमैन ओम कालवा की एंट्री के बाद में जो कुछ हुआ वह एक इतिहास है जिससे सभी शहरवासी वाकिफ है। कासनिया के कहने पर चेयरमैन कालवा ने पिछले साल 28 अगस्त को बुलाई बोर्ड बैठक में इस ज़मीन के आवंटन का प्रस्ताव एजेंडा नंबर-7 के जरिये शामिल कर लिया। प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान संसदीय गरिमा का जिस तरह से जमकर मखौल उड़ाया गया, वह सूरतगढ़ नगरपालिका बोर्ड के इतिहास काले अध्याय के रूप में दर्ज़ है। दरअसल मीटिंग से पहले सज़ाई गई खरीद फरोख्त की मंडी में ज्यादातर पार्षद अपना ईमान गिरवी रख चुके थे। राष्ट्रवादी पार्टी में अब कोई स्व. इंद्र सरावगी और सुशील अग्रवाल नहीं था जिनसे विरोध की उम्मीद की जा सके। सो कथित राष्ट्रवादियों ने टिकट, चांदी के चंद सिक्कों और सत्ता की दलाली के एवज में ही सरेंडर कर दिया। उधर कांग्रेसी पार्षदों की तो बात क्या ही करे। शहर की जनता के अखिकतर पैरोकार तो कोड़ियों के भाव ही सैल आउट हो गये। उस पर तुर्रा ये है कि इन्ही पार्षदों ने बोर्ड बैठक में अपनी नंगई का सबसे ज्यादा खुलकर प्रदर्शन भी किया।
इन सबसे इतर जो कुछ अनुभवी और शातिर थे, उन्होंने ठेकों में कमीशन, फ़र्ज़ी दस्तावेजों से बनाये पट्टे बचाने तो कुछ ने पट्टों देने के बदले सौदेबाज़ी कर ली। इन कथित जनसेवकों ने मीटिंग से बाहर रहकर प्रस्ताव पास करा शहर की जनता को ठगने का काम किया। अब बचे कम्युनिज़्म के पैरोकार तो वो भला पीछे क्यों रहते। सो उन्होंने पिछली बार की तरह इस बार भी कम्युनिज्म की लाश को कंधा देकर अपना फर्ज बखूबी अदा किया।
प्रस्ताव का विरोध करने वाले पार्षद भी नहीं है दूध के धुले
वैसे इस पुरे प्रकरण में प्रस्ताव का विरोध करने वाले सभी 8 पार्षद भी दूध के धुले नहीं थे। दरअसल इनमें एक-दो पार्षद ही थे, जिन्होंने लालच और दबाव को दरकिनार कर शहरहित में वोट किया। वरना कुछ ऐसे भी थे जिन्हे ज्यादा दाम मिलते तो वे भी बिककर गर्व महसूस करते। इसके अलावा एक-दो चतुर सुजान ऐसे भी थे जो पार्षदों की एक साथ बोली लगाने के चक्कर में खुद ही एक्सपोज़ हो गये। इन्होने अपनी फ़टी इमेज पर पेबंद लगाने के चक्कर में रिट-रिट खेलते हुए महीनो जनता को गुमराह किया और कुछ माह पूर्व अचानक रिट वापस लेकर 28 साल से चल रहे मामले में कासनिया को बाई दे दी। रिट वापसी के साथ ही कासनिया को जमीन आवंटन होने से कासनिया और कांग्रेस नेताओं की जुगलबंदी से भी पर्दा उठ चुका है।
बहरहाल इस जमीन आवंटन के साथ ही कासनिया सूरतगढ़ आने के अपने मक़सद में फिलहाल कामयाब हो चुके है। लेकिन इस पुरे एपिसोड ने कासनिया शख्सियत में जो दाग़ लगा दिया वह किसी वह किसी भी वाशिंग मशीन से भी धुपने वाला नहीं है।
–राजेंद्र पटावरी, अध्यक्ष -प्रेस क्लब, सूरतगढ़।
